Tuesday, November 15, 2022

Across the 'WALLS'

 “Forget about meeting, you would not be able to see even my face” told she in her as always mood.

“I don’t need to”, replied he without wasting a second, “you are always here in my eyes”.

“Every time you come to my mind, I put a Wall before my eyes, so that..................” she added further.

“I don’t forget my people, I just keep them close to my eyes”, responded he.

Since then, she has peeped thrice from that gigantic wall. Perhaps walls are the external barriers for those who don't have internal barriers. They also signify painful separation we human suffer once we put wall across emotions. 

Now to lessen her pain to climb unto the wall, he has sent a magical mirror, which would remind her of him by looking into herself.

WALLS ARE MEANT TO BE BROKEN AFTER A CERTIAN POINT OF TIME. THEY LOOSE  SIGNIFICANCE, IF NOT BROKEN TIMELY. THE BERLIN WALL WHICH DIVIDED GERMANY INTO TWO HALVES TO WEAKEN HER ECONOMICALLY AND MILITARILY WAS BROKEN. THE GREAT WALL OF CHINA WAS MADE TO DEFEND ITS FRONTIERS IS MERELY A SHOWPEACE NOW.

            WALLS AS STRUCTURES ARE USEFUL AT LEAST FOR A CERTAIN PERIOD OF TIME, WALLS AS EMOTIONS ARE OFTEN DESTRUCTIVE AS THEY PREVENT TEARS AND TALKS FROM MINGLING UP. I WONDER IF THERE COULD BE AN EXPIRY DATE OF EMOTIONAL WALLS. OR THERE SHALL BE SOME HOLES THROUGH WHICH ONE CAN SEND HAPPINESS TO THE OTHER SIDE DESPITE THE PASSIVITY ON THAT SIDE. AS ONE CAN'T PREVENT THE OTHER FROM BUILDING EMOTIONAL WALL BUT ONE CAN PREPARE A LADDER THROUGH WHICH ONE CAN PEPP INTO THE OTHER SIDE OF WALL. THAT WAY WE CAN LEAVE THE SCOPE TO MAKE THIS WORLD A BETTER PLACE TO LIVE.

A STUDENT OF HISTORY DOESN’T NEED TO TELL THIS TO A TEACHER OF HISTORY.

TO THE QUEEN OF THAMES !!

Thursday, January 20, 2022

!! नवागंतुक !!

जब नयनन रात दिनन के फेरन में पड़ना ही भूल गए 

जब पपीहे बरखा-सावन में मनमोदन करना भूल गए 

जब भौंरे कुंज-कानन में रस का आस्वादन ही भूल गए

सब पात झरे

सब जख्म हरे

हर रात मरे

अखियां पनियाँ  

दिल बेमनिया

टुकड़े छोड़े, मन को तोड़े, जब जीना मरना भूल गए। 

तब इस उपवन में तुम आए, मुस्काए थोड़ा हर्षाये ।। 1।।   


जब मधु के प्याले टूट गए संसार सुनहले छूट गए

जब घाटों पर बसने वाले गंगा के तट से रूठ गए

जब सपनों के पक्के बासन कच्चे कांकर से टूट गए

झंकार टूट गी 

साथ छूटा  

सब रस बह गा 

अखियां पनियाँ  

दिल बेमनिया

पायल टूटी, झंकार छुटी, सिंगार सभी अनमना उठे। 

फिर इस मधुबन में तुम छाए, मुस्काए थोड़ा हर्षाये।। २।। 


जब मन के मीत मरे निकले भीतर से कीच भरे निकले

जब बाहर दिल हारे पंछी घर भीतर हारे दिल निकले  

जब पलक रुआंसी हो पुतली से झर-झर नीर भरे निकले 

रणधीर वहीं

रणबीच मरे

निज त्राण हुआ 

अखियां पनियाँ  

दिल बेमनिया

आहट छूटी, परछाई हटी, विश्वास सभी डगमगा उठे। 

फिर इस निधिवन में तुम गाये, मुस्काए थोड़ा हर्षाये।। 3।। 


Thursday, December 10, 2020

To the Central Library, University of Delhi

Land of Pupils and Masters

Land of Books and Peers

Land of Learning and Wisdom's spell

I shall preserve your fragrance unto the death

O My Transformative Mentor! Forever Farewell!


You showered on everyone your unabated love

by turning saplings into resistive trunks

It's time your envelope fresh buds

to nurse new saplings like you nursed me

O Mother of Incubators! Forever Farewell!


Study resolutions turning into day-dreaming

exam date approaching like a hanging sword

newspaper reading, sleepy post lunch study

evening tea breaks and youthful campus

Listen O Nostalgic Zeal! forever farewell!




 

Thursday, September 28, 2017

नवदीप

है कोई जन्मा अभी नवदीप की इस लालिमा में
छा गया किन्तु जन्मते ही वो देखो कालिमा में
एक तरफ है शुभ घड़ी खुशियों का मेला
पीठ पीछे हर तरफ है संकटों का कोढ़ फैला
हे महा-राती मैं तुझसे कर रहा विनती  की मेरे दीप की बाती को बुझने से जरा ठहराइये

जन्म बेला है ख़ुशी की पास विजयदशमी है
रोशनी का पर्व है और उन्नति की रश्मि है
लाल को मेरे जिया दो धमनियां सर सर चला दो
भय के काले बादलों, खर दूषणों और रावणों को
राम के शर से चले एक बाण की शक्ति दिखाकर अभय मुझको तुम जरा दिखलाइये

घोर व्याकुल जननी है और सोच में हैं दादी-नानी
माँ की ममता है अधूरी दूध उसका पानी-पानी
नौनिहालों को जिला दो वक्ष को ढांढ़स बंधा दो
घुटमनों चलने लगे ऐसा कोई करतब दिखा दो
हे कन्हैया चक्रधारी मात की पीड़ा को तजकर अंचलों  की छावं में कस्तूरियाँ महकाइये 

हूँ अकेला इस समर में साथ में कोई ना दूजा
विनती है तुझसे शिवा हे कालरात्रि महापूजा
सिसकियों से अट गए मेरे पटल को
संकटों में पल रहे मेरे कमल को
किलकियों में तुम बदलकर अंजनी के लाल की भांति जरा ध्वज की पताका तुम मेरे फहराइए


Wednesday, August 16, 2017

WHY?

आखिर क्या था उसमें
जो मुझमें न था??

सुन्दर मैं उससे कहीं ज्यादा हूँ
चपलता और आकर्षण में मेरा कोई सानी नहीं
विद्व्ता, सहनशीलता, और शालीनता, मानो मेरे अंग हैं
ऐसा भी नहीं क़ि मैं रूठती ज्यादा हूँ
लक्ष्मण रेखा भी मैंने पार नहीं की
स्वभाव भी मधुर है
चंचल भी हूँ
हंसमुख हूँ

बेसाख्ता बता
ऐ जालिम, फर्क क्या था ???

जान छिडकनी थी 
काश! तुझसे हो पाता
ये तू और मैं का अंतर
हम बन जाता
ए मेरे याचक
ओ मेरे दाता
भाग्य-विधाता

Thursday, July 20, 2017

परम

मेरे किस्सों से कोई तर जाये ए मुहब्बत
तो हम भी कह सकेंगे
की हमे अपनी विफलता पे नाज़ है//

Monday, March 6, 2017

नहीं

तुझे संवरने को छोड़ा है बिखरने को नहीं
गहने भले उतार दे पर तेवर नहीं

तू बहता दरिया है कोई समंदर नहीं
मीठापन चाहे त्याग दे पर खारापन नहीं

ये मेरा इलाहबाद है तेरा जालंधर नहीं
भूल भले जा तू मुझे पर निरंतर नहीं

हाँ जीत थोड़ी दुष्कर है तू हारना नहीं
दिया भले बुझा दे पर अंधेरापन नहीं