Wednesday, March 21, 2012

प्यार के उपहार

मेरी मिटटी.....................वो उठा ले गये 
मेरी हस्ती......................वो चुरा ले गये 
मेरे दिल को....................वो दगा दे गये 

गहनों की सुनो गाथा दिल की सुनो विधाता 
पैरों में पड़ी बेडी फिर भी है मांग टेडी 
हाथों में हथकड़ी है फिर भी है बात छेडी
कानों में कील ठोंकी माथे तिलक लहू का 
गल में सजा है फंदा सर मुकुट कंटकों का 
चाबुक पड़े कमर पे इतनी पगार दे गये 
मेरी मिटटी..................................

कोल्हू के बैल बनके पीपे लहू के भरते 
इस बंद कोठरी में ताउम्र हम हैं सड़ते 
छिलके वो नारियल के घिस घिस के हम रगड़ते 
दारू-दवा मिली ना टुकड़ों का हम क्या करते 
वो देख हमको रोते हम देख उनको हँसते 
पाखाना साफ़ करते इतनी पगार दे गये 
मेरी मिटटी................................

चंदा को दिन  में देखा सूरज को वन में देखा 
सागर में देखि ज्वाला शीतल है काल देखा 
एक देशभक्त मैंने नानी गोपाल देखा 
जिसे देख सूर्य जलता ऐसा वो लाल देखा 
कहते तो बहुत देखे करता वो एक देखा 
बेगानी बस्तियों में अनजाने यार दे गये 
मेरी मिटटी...............................

Tuesday, March 20, 2012

दिल्ली हाई-कोर्ट बम-ब्लास्ट

Following poem is based on Delhi High Court Blast that crucially gulped the lives of 12 people and another 76 were seriously injured. The poem is based on a real life incident where a girl (6 year old) whose father was killed in those blasts asking his uncle about the incident. The blast held on 07 Sep. 2011 which was preceded by Diwali. The context here is based on the fact that months before Diwali children starts celebration in the form of Aatish-baazi. The name of the girl is मिष्टी....!



छोटी सी वो मिष्टी मेरी कहती मुझे है चाचा
पूछ रही है बड़ा चहककर कैसे हुआ धमाका

बड़ी जोर से आयीं आवाजें बड़े बड़े भी कांपे
इत्ता मोटा बम्ब था वो की पापाजी भी भागे

बिना दिवाली फोड़े किसने बम्ब ये मुझे बताओ
वर्ना मम्मी से कहलाकर मुझे भी बम्ब दिलाओ

चाचा चाचा छोड़ो सब कुछ बस इतना तो करना
अगली बार धमाका हो तो मुझे है दर्शन करना

चाकरी होगी रोकेट होगा क्या क्या होगा चाचा
क्या बताऊँ मैं इस बच्ची को कौन सा होगा पटाका

ओ मानवता के रक्षक तू ही इसको समझा दे
मुझको  होश नही अब तो बस तू ही राह दिखा दे

इतना निश्चित कर के जग में ना हो कोई धमाका
फिर बच्ची ना पूछे कोई कौन सा था वो पटाका

जग में आशा भर दे और बच्चों को दे खुशहाली
ताकि ईद मने घर-घर में और मने दीवाली


And remember, next time it can be your Misti, Mahi or Matki. So stand and fight against terrorism until it removed entirely from our city, our country and our planet......!!!









भारती के लाल


निडर बनो अजर बनो नई कोई डगर चुनो
मरहम बनो हरम बनो वतन का हमवतन चुनो


समुद्र में रहो अगर समुद्र की लहर चुनो 
धरा पे पग धरो जो तुम तो हिंद सा वतन चुनो
वतन की आन पे जियो तो वन्दे-मात-रम चुनो
वतन की आन पे मरो तो जन-गण-मन चुनो 
निडर बनो .........


नब्ज बनो निराला की कलाम की कलम बनो
करण दधिची एकलव्य भीष्म के परण बनो 
जो बन सको तो तुम बनो रिदम लता रफीक की 
या पृथ्वीराज रासो के तुम आल्हा औ ऊदल बनो 
जो दमदमे का दम भरो तो दम-दमा-दमा-दमम 
या दमदमे में दफ्न हो सुनीता विलियम बनो 
निडर बनो .............


निगाह ना झुके कभी इरादे ना चुकें कभी
किरीट मुकुट हिमालय सा नही यदा झुके कभी 
सदा चलो सधे कदम वसुधा बने कुटुम्बकम 
अदम्य साहसी बनो सुरम्य हो पराक्रमी 
जिजीविषा हो अंक में औ ध्यान में धीरज धरे 
धुरंधरों के तुम धरम दिगम्बरों के तुम दिगम 
उज्जवल शशांक सुन्दरम तन पर कवच-कुंडल धरो 
निडर बनो ...............

मुक्तक

चार लाईने लिखी हैं, आपके और अपने लिए, तुम्हारे और हमारे लिए, तेरे और मेरे लिए, एक सीमित समझ के प्राणी ने असीमित समजदारी की बात कह दी, शंकु ने शंक से अपने जज्बात कह दी:


                                                      तुमने आना छोड दिया
                                                      या हमने बुलाना छोड दिया 
                                                      सवाल इस बात का नही 
                                                      बल्कि दुःख इस बात का है 
                                                      की तुमने दारू छोड दी 
                                                      हमने मैखाना छोड दिया 




                                                           ये क्या हाल हुआ 
                                                           तेरे दोस्त का 
                                                           ऐ मेरे दोस्त
                                                           चाक हुए कुरते 
                                                           उडी हुई रंगत का 
                                                           ऐ मेरे दोस्त
                                                           वो आज नाज़ी है 
                                                           जिसे कभी नाज था तुझ पर  
                                                           वो आज बागी है 
                                                           जो कभी बाग़-बाग़ था तुझ पर 
                                                           और सुन 
                                                           तुझे बदनाम गलियों से
                                                           बचा कर के जो था लाया 
                                                           हुआ बदनाम फिरता है 
                                                           उन्ही गलियों में वो काफर 


Sunday, March 4, 2012

Comparison of Love: Tera Saani ya Mera Saani




तेरा मदमस्त यौवन,  मेरी रुखी जवानी
कोई तेरा सानी, कोई मेरा सानी //

भोर के सूरज की लाली, चाँदी तिमिर के चंदा की/
मेघ की कर्कश हलाली, वृष्टि बूंदे वर्षा की//
दिव्या ज्योति जुगनुओं की, और सुनामी सागरों की/
बल पौरुष क्षत्रियों का, विनय या फिर साधुओं की//
शंख की शोणित ध्वनी हो, या स्वयंवर का धनुष हो/
विजय होगी सत्य की ही, झूठ कितना ही बालिश हो//
प्रेम की कविता हो प्यारे, जंग की ना हो जुबानी/
है कोई क्या तेरा सानी, है कोई क्या मेरा सानी//

देख वो उड़ती पतंगे, हैं मेरे दिल की उमंगें/
झूमता मदमस्त सावन, है मेरी यादों का आँगन//
कोकिलाएं कोयलों की, तरुण छाया तरवरों की/
नीम की वो डंठलें भी, डली लगतीं शक्करों की//
प्रेम की अविरक्त इच्छा, तड़प मानो बादलों की/
मधुर बेला की बहारें, गीत गायन और मल्हारें//
शांत हैं चंचल फुहारें, मौन हैं वीणा की तानें/
ऐसी इच्छा तेरी सानी, ऐसी इच्छा मेरी सानी// 


अबके अंजुम की लपट को, ज्वार भाटा की झपट को/
घुंघरूओं की इस डपट को, अंचलों की इस झटक को//
हमने है वीरान देखा, हमने है बेजान देखा/
रूप जो था सागरों का, अक्स जो था शायरी का//
सोच में गुमसुम कहीं, ठहराव का आयाम देखा/
सनसनाती सनसनी में, सन उगाने हम चले हैं//
शान से ताने कमानी, है तमन्ना की जुबानी/
तीर सानी, जिगर सानी.........जखम सानी, मरहम सानी//