Friday, December 30, 2016

लगाव


मुझे तेरी नाक से मुहब्बत है, तुझे शायद आँख का शुबहा है
रौशनी तो मेरी कब की छिन चुकी, अब तो बस खुशबु का मजा है 

Thursday, December 22, 2016

चल

चला चल, चला चल, चला चल-चला चल
ये मंजिल हैं तेरी तू राही बना चल 

!! कृति !!



जिसकी कृति तू, जिसका चन्दन !
ओ कृतिके उसको अभिनन्दन !!

महक उठे वसुधा, जब भौंरा करे है गुंजन !
अनिल-पूज्य की कृति को बारम्बार निमंत्रण !!

बरखा चले, पुष्प महके, रवि पहुंचे जन-जन !
कृति निराली हो अपनी, करते हम कृत-कृत वंदन !!

अभी राम थोड़ा व्याकुल है, अभी भरत पर हावी लक्ष्मन !
परशुराम से जाकर कहदे, कृति के सम्मुख करे समर्पण !!

अभी बाजियों में चीते हैं, अभी गजों को कहाँ निराशा, अभी कहाँ काली का क्रंदन !
अभी कर्ण ने कवच दिया है, उज्जवल हो सर्वस्व दिया है, अभी कहाँ कृति का स्पंदन !!

हे कृतिके तुझको अभिनन्दन !!!


Wednesday, December 21, 2016

भूल


तू याद से भुलाना मुझे
मैं तुझे भूल से याद आऊंगा 

Sunday, December 11, 2016

तू कैसी मीरा है..................

चुप्पी भी है तुझमे, शरारत सी भी है
गोरा है रंग तेरा, जरा काली सी भी है
चलती तो ठीक ठाक है,  हाँ इठलाती भी है
चेहरे पे रुबाई है , पर मन पर पहरा है
सीधी तरह बता दे, ये राज जो गहरा है
तू कैसी मीरा है..................

अमरबेल पे ज्यों झूलों से, नयन तेरे बरकस फूलों से
चिक्की जैसा गाल पे तिल है, नाक तेरी नखराई है
हँसे तो मानो मोती बिखरें, मधुकर सी छवि पायी है
ता पर भी तू सोच करे है, अंधियारे में ध्यान धरे है
मीत न समझे,  मोल ना जाने, पास सवेरा है
तू कैसी मीरा है..................


टुकड़े टुकड़े दिन बीता है, तेरे बिना ये जग रीता है
मोती बिना हंस ना होवे, मृग कस्तूरी को जीता है
जुगनू करे रौशनी रातों, पपीहा सावन को तरसे है
जैसे भी हो जितना भी हो अम्बर से ही रस बरसे है
बात मान जा, हठ रहने दे, सब कुछ तेरा है
तू कैसी मीरा है.............

मौन धरा अबके उसने है अबके उसने पीड़ा गायी
अबके उसने चटक चाँद से दूध भरी स्याही मंगवाई
कुंए में हैं नीर गिराए नदिया को दे दी परछाई
पायलिया जोगी को दे दी कोयल को बोली भिजवाई
अबके उसने दिखा दिया वो भी जगनीरा है
वो कैसी मीरा है..............................

सांकल लगा भले लेटी हो, मन की कुंडी खटक रही है
संगत जमा भले बैठी हो, मन की रंगत घुमड़ रही है
स्वाति-बूँद चातक को तजकर छिटक पड़ी भूमि पर जब से
तब से बुझी हुई करसी में चिनगी जैसे रमक रही है
कस्तूरी अंचल में बंधी है वो ढूंढे है गली-गली में
वो ऐसी मीरा है................