चुप्पी भी है तुझमे, शरारत सी भी है
गोरा है रंग तेरा, जरा काली सी भी है
चलती तो ठीक ठाक है, हाँ इठलाती भी है
चेहरे पे रुबाई है , पर मन पर पहरा है
सीधी तरह बता दे, ये राज जो गहरा है
तू कैसी मीरा है..................
अमरबेल पे ज्यों झूलों से, नयन तेरे बरकस फूलों से
चिक्की जैसा गाल पे तिल है, नाक तेरी नखराई है
हँसे तो मानो मोती बिखरें, मधुकर सी छवि पायी है
ता पर भी तू सोच करे है, अंधियारे में ध्यान धरे है
मीत न समझे, मोल ना जाने, पास सवेरा है
तू कैसी मीरा है..................
टुकड़े टुकड़े दिन बीता है, तेरे बिना ये जग रीता है
मोती बिना हंस ना होवे, मृग कस्तूरी को जीता है
जुगनू करे रौशनी रातों, पपीहा सावन को तरसे है
जैसे भी हो जितना भी हो अम्बर से ही रस बरसे है
बात मान जा, हठ रहने दे, सब कुछ तेरा है
तू कैसी मीरा है.............
मौन धरा अबके उसने है अबके उसने पीड़ा गायी
अबके उसने चटक चाँद से दूध भरी स्याही मंगवाई
कुंए में हैं नीर गिराए नदिया को दे दी परछाई
पायलिया जोगी को दे दी कोयल को बोली भिजवाई
अबके उसने दिखा दिया वो भी जगनीरा है
वो कैसी मीरा है..............................
सांकल लगा भले लेटी हो, मन की कुंडी खटक रही है
संगत जमा भले बैठी हो, मन की रंगत घुमड़ रही है
स्वाति-बूँद चातक को तजकर छिटक पड़ी भूमि पर जब से
तब से बुझी हुई करसी में चिनगी जैसे रमक रही है
कस्तूरी अंचल में बंधी है वो ढूंढे है गली-गली में
वो ऐसी मीरा है................