Monday, October 26, 2015

याद कर

चाहे  इस तरह से याद कर, चाहे  उस तरह से याद  कर 
हम, तेरे अपने थे, अपने हैं, और अपने रहेंगे 
चाहे जिस तरह से याद कर 

समंदर बड़ा है पर  जमीन भी छोटी थोड़े है 
दुनिया में रहते हुए हमने दुनियादारी छोड़ी  थोड़े है 
चाहे धरती में छेद कर या आसमां में सूराख़ कर 
हमें उस तरह से याद  कर 
हमें उस तरह से याद  कर 

तेरी पीर के टपके हैं या दीपक की रोशनाई है 
चोट भले इधऱ हो पर आँच उधर भी आई है 
इन बातों को सोच के तू मत ज़िगर को चाक कर 
हमें इस  तरह से याद  कर 
हमें इस  तरह से याद  कर 

तेरे पीछे, ना उदास हुए, ना मन मसोसा 
ना तेरे बारे में कुछ उल्टा सीधा सोचा 
तू भी बढ़ आगे, कदम बढ़ा, औ प्यादे से वज़ीर की मात कर 
गर करना है तो इतना कर 
हमे याद कर हमे याद कर //

Thursday, January 1, 2015

तिकड़मबाजी का हश्र

तेरे सब्र की इन्तहा
मेरे हश्र की मुत्तालिक है
उफ़
मैं अब समझा
मेरे मुँह पर
क्यूँ ये कालिख है /

तेरा भरम टूट गया
वो मरम छूट गया
जीने मरने की
साथ चलने की
तमन्नाओं का
वो
अंजुमन छूट गया
मंशा तो नही है
पर अब रुका भी नहीं जाता
ले मैं कह ही देता हूँ
तू... तू अब भी नाबालिग है /

सुना मत बस सुनता रह
लपट है चाशनी थोड़े है
अल्फाज घोले हैं उसने ज़हर में
ले हमने भी कलेजे से पत्थर बाँध लिया
जो होना है सो हो
जब दोनों ने है ठान लिया
चल अब सीढ़ियां चढ़, करतब बदल, कदम खींच
पहले मेरी टांग तोड़ फिर सर
और कर ले तख़्त कब्जे में
बस इतना याद रखना
वो ऊष्मा का सुचालक है//