Thursday, September 28, 2017

नवदीप

है कोई जन्मा अभी नवदीप की इस लालिमा में
छा गया किन्तु जन्मते ही वो देखो कालिमा में
एक तरफ है शुभ घड़ी खुशियों का मेला
पीठ पीछे हर तरफ है संकटों का कोढ़ फैला
हे महा-राती मैं तुझसे कर रहा विनती  की मेरे दीप की बाती को बुझने से जरा ठहराइये

जन्म बेला है ख़ुशी की पास विजयदशमी है
रोशनी का पर्व है और उन्नति की रश्मि है
लाल को मेरे जिया दो धमनियां सर सर चला दो
भय के काले बादलों, खर दूषणों और रावणों को
राम के शर से चले एक बाण की शक्ति दिखाकर अभय मुझको तुम जरा दिखलाइये

घोर व्याकुल जननी है और सोच में हैं दादी-नानी
माँ की ममता है अधूरी दूध उसका पानी-पानी
नौनिहालों को जिला दो वक्ष को ढांढ़स बंधा दो
घुटमनों चलने लगे ऐसा कोई करतब दिखा दो
हे कन्हैया चक्रधारी मात की पीड़ा को तजकर अंचलों  की छावं में कस्तूरियाँ महकाइये 

हूँ अकेला इस समर में साथ में कोई ना दूजा
विनती है तुझसे शिवा हे कालरात्रि महापूजा
सिसकियों से अट गए मेरे पटल को
संकटों में पल रहे मेरे कमल को
किलकियों में तुम बदलकर अंजनी के लाल की भांति जरा ध्वज की पताका तुम मेरे फहराइए


Wednesday, August 16, 2017

WHY?

आखिर क्या था उसमें
जो मुझमें न था??

सुन्दर मैं उससे कहीं ज्यादा हूँ
चपलता और आकर्षण में मेरा कोई सानी नहीं
विद्व्ता, सहनशीलता, और शालीनता, मानो मेरे अंग हैं
ऐसा भी नहीं क़ि मैं रूठती ज्यादा हूँ
लक्ष्मण रेखा भी मैंने पार नहीं की
स्वभाव भी मधुर है
चंचल भी हूँ
हंसमुख हूँ

बेसाख्ता बता
ऐ जालिम, फर्क क्या था ???

जान छिडकनी थी 
काश! तुझसे हो पाता
ये तू और मैं का अंतर
हम बन जाता
ए मेरे याचक
ओ मेरे दाता
भाग्य-विधाता

Thursday, July 20, 2017

परम

मेरे किस्सों से कोई तर जाये ए मुहब्बत
तो हम भी कह सकेंगे
की हमे अपनी विफलता पे नाज़ है//

Monday, March 6, 2017

नहीं

तुझे संवरने को छोड़ा है बिखरने को नहीं
गहने भले उतार दे पर तेवर नहीं

तू बहता दरिया है कोई समंदर नहीं
मीठापन चाहे त्याग दे पर खारापन नहीं

ये मेरा इलाहबाद है तेरा जालंधर नहीं
भूल भले जा तू मुझे पर निरंतर नहीं

हाँ जीत थोड़ी दुष्कर है तू हारना नहीं
दिया भले बुझा दे पर अंधेरापन नहीं 

Tuesday, February 28, 2017

जीत

उसने देखा कि मैं समझौते के मूड में हूँ
सखियाँ बोलीं, ले, आखिरकार तेरी जीत हुई
और उसकी हार;
बस, उसने उन्हें यह नहीं  बताया
कि वो समर्पण से समझौते पर आया है
इक अजब सी जीत अपने साथ लाया है 

अतातुर्क

जब रौशनी बुझने लगे तो समझना, काज़ल पल रहा है 

Thursday, February 23, 2017

उड़ान

सुख़नवरों पे पर्दा गिराना है
मुझे चकाचौंध को चुँधियाना है
गीले लिबास पे कम्बल डाल के
मैंने भाप बनके उड़ते जाना है 

Wednesday, February 22, 2017

मैं

अगर ये पहले आप की जंग है
तो मैं दूब घास की तरह झुकता हूँ
पर अगर ये अड़ने का माददा है
मैं तनावर दरख़्त की तरह खड़ा हूँ 

Thursday, February 16, 2017

Rule of BODMASS


Rule Of BODMAS

‘One’ and ‘Two’
having revolved the Sun twice
decided to become
 “ONE”

The commitment was strong
but the path to be “One”
required disproportionate deduction
as ‘One’ had to go half and ‘Two’
needed three forth subtraction

At first, current was produced
Spark did fly
Ominously ho!
Wind of meanness blew
‘Two’ deduced only fifty percent of itself
demanding the same absolute deduction from ‘One’

‘One’ smiling in its pensive silence
Without uttering a word
Subtracted one from itself to go zero
and asked ‘Two’ to come and espouse

Post embracement
‘One’ and ‘Two’
By addition though became
“One”
Yet by multiplication remained
“None”
That is how the dream job was done



[DEDICATED TO ‘TEARS’, GIGGLING IN THE RAINY SUNSHINE]

Sunday, January 29, 2017

सांसे तेरे हवाले

अब तो तेरे हैं हवाले
ये जियाले, ये जियाले

जुगनुओं से रात झांके
पर्वतों पे  मोर नाचे
जब से हिलने से लगे हैं
मन के कच्चे-कच्चे धागे
अब तो तेरे हैं ...........

हाथ कंगना बांध रहा है
मन में पपीहा बज रहा है
जब से कटने से लगे हैं
मुझसे मेरे ही परछाए
अब तो तेरे हैं..........

तिलक चन्दन भों पे है अब
मगन दीपक लौ पे है अब
जब से जंचने से लगे हैं
घूंघटों के उसको साये
अब तो तेरे हैं..........

हसरतों के नयन फूंके
शरबतों से अर्क चूसा
दिल के तोड़े उसने ताले
खत पुराने हैं निकाले
अब तो तेरे हैं...........

अभिलाषा

मैं लिख जाऊंगा सरगम के सात सुरों की अभिलाषा
तू जब सुरभित होना चाहे कोई तान छेड़ देना

पक्के रस्तों पे तुझको जब कच्चे जामुन कभी दिखें
ढलते सूरज में तुझको जब शीतलता का पंक दिखे
उड़ते पंछी के पंखों में सपने जब तुझको दीखें
जब दीखे तुझको पतंग में अंतरिक्ष की अभिलाषा
बंद पिंजरे में कोई बुलबुल बस जरा छोड़ देना
मैं लिख जाऊंगा..............................

Friday, January 13, 2017

मैं

मैं बिगड़ी हुई चीज हूँ
सुधार ले,
गर साथ रखना है/

मैं आकृति विहीन हूँ
ढाल ले,
गर हाथ चीकना है/

मैं कच्ची शराब हूँ
पका ले,
नहीं तो तेरा मरना है/

मैं निंदियाती रात हूँ
उठा  ले
गर साथ जगना है/

मैं उच्श्रृंखल प्यास हूँ
बुझा ले
गर तृप्त होना  है/

मैं अनंत आकाश हूँ
समा ले
गर तुझमें सपना है/

Saturday, January 7, 2017

The other side of lady Hitler

She was alone for a few days
barely talking to anyone
responding none
motionless
without any reaction
calm, placid, without a blink
thinking, remembering, analyzing and measuring
she seemed to be anxious, as if  missing something
people thought she was sad for she was lone in her silence
and stared at her with questionable eyes
a moment later
she glanced back with answerable eyes
smiling in her pensive silence
taking water of loneliness to her deep dimples on both cheeks
vanishing the misconception of loneliness
without even opening lips
into
Solitude