Thursday, January 1, 2015

तिकड़मबाजी का हश्र

तेरे सब्र की इन्तहा
मेरे हश्र की मुत्तालिक है
उफ़
मैं अब समझा
मेरे मुँह पर
क्यूँ ये कालिख है /

तेरा भरम टूट गया
वो मरम छूट गया
जीने मरने की
साथ चलने की
तमन्नाओं का
वो
अंजुमन छूट गया
मंशा तो नही है
पर अब रुका भी नहीं जाता
ले मैं कह ही देता हूँ
तू... तू अब भी नाबालिग है /

सुना मत बस सुनता रह
लपट है चाशनी थोड़े है
अल्फाज घोले हैं उसने ज़हर में
ले हमने भी कलेजे से पत्थर बाँध लिया
जो होना है सो हो
जब दोनों ने है ठान लिया
चल अब सीढ़ियां चढ़, करतब बदल, कदम खींच
पहले मेरी टांग तोड़ फिर सर
और कर ले तख़्त कब्जे में
बस इतना याद रखना
वो ऊष्मा का सुचालक है//

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