तेरे सब्र की इन्तहा
मेरे हश्र की मुत्तालिक है
उफ़
मैं अब समझा
मेरे मुँह पर
क्यूँ ये कालिख है /
तेरा भरम टूट गया
वो मरम छूट गया
जीने मरने की
साथ चलने की
तमन्नाओं का
वो
अंजुमन छूट गया
मंशा तो नही है
पर अब रुका भी नहीं जाता
ले मैं कह ही देता हूँ
तू... तू अब भी नाबालिग है /
सुना मत बस सुनता रह
लपट है चाशनी थोड़े है
अल्फाज घोले हैं उसने ज़हर में
ले हमने भी कलेजे से पत्थर बाँध लिया
जो होना है सो हो
जब दोनों ने है ठान लिया
चल अब सीढ़ियां चढ़, करतब बदल, कदम खींच
पहले मेरी टांग तोड़ फिर सर
और कर ले तख़्त कब्जे में
बस इतना याद रखना
वो ऊष्मा का सुचालक है//
मेरे हश्र की मुत्तालिक है
उफ़
मैं अब समझा
मेरे मुँह पर
क्यूँ ये कालिख है /
तेरा भरम टूट गया
वो मरम छूट गया
जीने मरने की
साथ चलने की
तमन्नाओं का
वो
अंजुमन छूट गया
मंशा तो नही है
पर अब रुका भी नहीं जाता
ले मैं कह ही देता हूँ
तू... तू अब भी नाबालिग है /
सुना मत बस सुनता रह
लपट है चाशनी थोड़े है
अल्फाज घोले हैं उसने ज़हर में
ले हमने भी कलेजे से पत्थर बाँध लिया
जो होना है सो हो
जब दोनों ने है ठान लिया
चल अब सीढ़ियां चढ़, करतब बदल, कदम खींच
पहले मेरी टांग तोड़ फिर सर
और कर ले तख़्त कब्जे में
बस इतना याद रखना
वो ऊष्मा का सुचालक है//
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