जिसकी कृति तू, जिसका चन्दन !
ओ कृतिके उसको अभिनन्दन !!
महक उठे वसुधा, जब भौंरा करे है गुंजन !
अनिल-पूज्य की कृति को बारम्बार निमंत्रण !!
बरखा चले, पुष्प महके, रवि पहुंचे जन-जन !
कृति निराली हो अपनी, करते हम कृत-कृत वंदन !!
अभी राम थोड़ा व्याकुल है, अभी भरत पर हावी लक्ष्मन !
परशुराम से जाकर कहदे, कृति के सम्मुख करे समर्पण !!
अभी बाजियों में चीते हैं, अभी गजों को कहाँ निराशा, अभी कहाँ काली का क्रंदन !
अभी कर्ण ने कवच दिया है, उज्जवल हो सर्वस्व दिया है, अभी कहाँ कृति का स्पंदन !!
हे कृतिके तुझको अभिनन्दन !!!
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