तेरा मदमस्त यौवन, मेरी रुखी जवानी/
न कोई तेरा सानी, न कोई मेरा सानी //
भोर के सूरज की लाली, चाँदी तिमिर के चंदा की/
मेघ की कर्कश हलाली, वृष्टि बूंदे वर्षा की//
दिव्या ज्योति जुगनुओं की, और सुनामी सागरों की/
बल व पौरुष क्षत्रियों का, विनय या फिर साधुओं की//
शंख की शोणित ध्वनी हो, या स्वयंवर का धनुष हो/
विजय होगी सत्य की ही, झूठ कितना ही बालिश हो//
प्रेम की कविता हो प्यारे, जंग की ना हो जुबानी/
है कोई क्या तेरा सानी, है कोई क्या मेरा सानी//
देख वो उड़ती पतंगे, हैं मेरे दिल की उमंगें/
झूमता मदमस्त सावन, है मेरी यादों का आँगन//
कोकिलाएं कोयलों की, तरुण छाया तरवरों की/
नीम की वो डंठलें भी, डली लगतीं शक्करों की//
प्रेम की अविरक्त इच्छा, तड़प मानो बादलों की/
मधुर बेला की बहारें, गीत गायन और मल्हारें//
शांत हैं चंचल फुहारें, मौन हैं वीणा की तानें/
ऐसी इच्छा तेरी सानी, ऐसी इच्छा मेरी सानी//
अबके अंजुम की लपट को, ज्वार भाटा की झपट को/
घुंघरूओं की इस डपट को, अंचलों की इस झटक को//
हमने है वीरान देखा, हमने है बेजान देखा/
रूप जो था सागरों का, अक्स जो था शायरी का//
सोच में गुमसुम कहीं, ठहराव का आयाम देखा/
सनसनाती सनसनी में, सन उगाने हम चले हैं//
शान से ताने कमानी, है तमन्ना की जुबानी/
तीर सानी, जिगर सानी.........जखम सानी, मरहम सानी//
No comments:
Post a Comment